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Sunday, December 12, 2010

5.6 यह देश और इसकी नियति 5.6 (क) अगर नेताजी दिल्ली पहुँच जाते तो...




इस देश के साथ नियति ने बहुत सारे छल किये हैं। संक्षेप में कुछ का जिक्र किया जा रहा है- 
1. दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में जब देश के पश्चिमोत्तर प्रान्त में आक्रमण हो रहे थे, तब सीमा पर किलेबन्दी करने के बजाय हम खजुराहोमें अन्तिम कुछ मन्दिरों के नींव रखने में व्यस्त थे।
2. शेरशाह सूरी को शासन के लिए सिर्फ पाँच साल मिलते हैं।
3. दारा शिकोह युद्ध जीतते-जीतते औरंगजेब से हार जाता है।
4. पलासी की मोर्चेबन्दी में रात में बारिश होती है- खुले में मोर्चा बाँधे सिराजुद्दौला की सेना का गोला-बारूद भींग जाता है, जबकि आम के बगान में मोर्चा बाँधे अँग्रेजों के गोला-बारूद भींगने से बच जाते हैं।
5. 1922 में चौरी-चौराघटना के कारण आजादी मिलते-मिलते रह जाती है।
6. 1939 में नेताजी को काँग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देना पड़ता है।
7. 1942 में जर्मन सेना की मदद से, 1944 में जापानी सेना की मदद से और इसके बाद सोवियत सेना की मदद से नेताजी दिल्ली नहीं पहुँच पाते हैं।
इन सबका परिणाम यह होता है कि 10वीं सदी तक सोने की चिड़ियारहा देश लम्बे समय के लिए गुलाम बन जाता है, बेहतर शासकों को शासन करने का अवसर नहीं मिलता और आजाद होने के बाद भी यह देश विश्व के मानचित्र में ऊँचा स्थान नहीं बना पाता।
                (प्रसंगवश- मुगल-शासक भले बाहर से आये थे, मगर वे भारतीयबन जाते हैं और देश का धन बाहर नहीं ले जाते; इसके मुकाबले अँग्रेज यहाँ के उद्योग-धन्धों को चौपट करते हैं, विश्व-व्यापार में देश की हिस्सेदारी को कम करते हैं और यहाँ से धन ले जाकर ब्रिटेन का औद्योगीकरण करते हैं। यह ठीक है कि अँग्रेजों ने भारत को रेल दिया, मगर उनका मुख्य उद्देश्य था- देश के अन्दरुनी भागों से कच्चे माल को कम लागत पर बन्दरगाहों तक पहुँचाना; अँग्रेजों ने देश को टेलीग्राम दिया, मगर उनका मुख्य उद्देश्य था- 1857-जैसी क्राँति फिर होने पर सेना का बेहतर संचालन करना; अँग्रेजों ने देश में ढेर सारे निर्माण करवाये, मगर इस उम्मीद में कि अभी 500-1000 वर्षों तक भारत उनका उपनिवेश बना रहेगा।)
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फॉरवर्ड ब्लॉकके मियाँ अकबर शाह से लेकर इण्डियन लीजनके आबिद हसन तक, और फिर आजाद हिन्दके हबिबुर्रहमान तक, नेताजी के सैकड़ों मित्र एवं सहयोगी मुसलमान थे। इण्डियन लीजनऔर आजाद हिन्द सेनामें मुसलमान सैनिकों की बड़ी संख्या थी, जो नेताजी से प्यार करते थे। यहाँ इस तथ्य का जिक्र सिर्फ इसलिए किया जा रहा है ताकि सहज ही अनुमान लगाया जा सके कि ...अगर नेताजी दिल्ली पहुँचगये होते, तो आज हमारा देश तीन टुकड़ों में बँटा हुआ नहीं होता!
दूसरी बात, अँग्रेजों के तलवे सहलाने वाले जो बाद में एम.पी., एम.एल.ए. बनने लगे, यह नेताजी नहीं होने देते! (सत्ता सम्भालने के बाद नेताजी के पहले कामों में से एक होता- इन गद्दारों को काला पानीभेजना।) 
तीसरी बात, पहले आम चुनाव से लेकर अब तक जो वोट खरीदनेकी बातें सामने आती हैं- यह भी नहीं होता। क्योंकि हर किसी को वयस्क मताधिकारदेने में नेताजी जल्दीबाजी नहीं करते। 10-15 वर्षों में नागरिकों को शिक्षित एवं जागरूक बनाने के बाद ही वे नागरिकों को वोट देने की जिम्मेवारी और अधिकारप्रदान करते!
चौथी बात, सेना और पुलिस का ब्रिटिश हैंगओवरवे एक झटके में उतार देते! बेशक, जो अधिकारी राजी नहीं होते, उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता। (रात जमकर शराब पीने के बाद सुबह नीन्द से उठने पर भी जो नशा रहता है, उसे हैंग-ओवरकहते हैं। यहाँ ब्रिटिश हैंगओवर से तात्पर्य है- खुद को अँग्रेजया शासक तथा आम लोगों/सिपाहियों को भारतीय या गुलाम समझने की मानसिकता।)
पाँचवी बात, ‘लालफीताशाहीवे पनपने ही नहीं देते। एक आई.सी.एस. या आई.ए.एस. अधिकारी एक साधारण नेता पर हावी हो सकता है, मगर नेताजी-जैसे प्रतिभाशाली नेता के सामने उनकी एक न चलती और बाद में भी नेताजी ऐसी चुनाव-व्यवस्था करते कि प्रतिभाशाली नेता ही चुनकर एम.पी., एम.एल.ए. बनते और इस प्रकार, ब्यूरोक्रैसी कभी व्यवस्था पर हावी नहीं हो पाती।
अब एक सबसे महत्वपूर्ण बात- कृपया इसे ध्यान से पढें-
शाहनवाज खान नेताजी के दाहिने हाथ रहे थे- इसमें दो राय नहीं है। मगर जैसे ही इम्फाल-कोहिमा सीमा से खबर आती है कि खान ब्रिटिश सेना में तैनात अपने भाई के सम्पर्क में हैं, नेताजी न केवल खान को रंगून मुख्यालय बुला लेते हैं, बल्कि कोर्ट-मार्शलका भी आदेश दे देते हैं। अगर नेताजी का भाई या भतीजा खान के स्थान पर होता, तो भी नेताजी दया नहीं दिखाते। बाद में, कुछ कारणों से खान का कोर्ट-मार्शल तो नहीं हो पाया, मगर खान को नेताजी ने अपने निकट भी नहीं आने दिया। सिंगापुर के अन्तिम दिनों में नेताजी साथ रहने वाले जिन सहयोगियों के नाम आते हैं, उनमें शाहनवाज खान का जिक्र नहीं है।
इसके मुकाबले नेहरूजी का रवैया देखिये- 1948 में देश में पहला घोटाला होता है- जीप घोटाला। घोटाला करने वाले हैं- ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त श्री वी.के. कृष्ण मेनन, जो नेहरूजी के दाहिने हाथ हैं। सेना के लिए 1500 जीपों की खरीद के लिए 1 लाख 72 हजार पाउण्ड की धनराशि का अग्रिम भुगतान विवादास्पद कम्पनी को कर दिया जाता है। जो 155 जीपें पहली खेप में आती हैं, वे चलने लायक भी नहीं हैं। 1949 में जाँच होती है, सरसरी तौर पर मेनन को दोषी ठहराया जाता है; मगर नेहरूजी 30 सितम्बर 1955 को मामले को बन्द करवा देते हैं। इतना ही नहीं, 3 फरवरी 1956 को मेनन को वे केन्द्रीय मंत्री बना देते हैं। सेना के लिए जीप खरीद घोटाला करने वाले को रक्षामंत्री बना दिया जाता है!
...अतः यह हमारे देश के साथ नियति का छल ही माना जायेगा कि नेताजी दिल्ली नहीं पहुँच पाते हैं और हमारा देश एक खुशहाल, स्वावलम्बी और शक्तिशाली देश नहीं बन पाता है... इसके बदले नेहरूजी को 17 वर्षों तक देश पर शासन करने का मौका मिलता है, जो देश के पहले घोटाले के दोषी को पुरस्कृत कर एक गलत परम्परा की शुरुआत कर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप 21वीं सदी के दूसरे दशक की उदय बेला में आज देश एक घोटालेबाजदेश के रुप में विश्व में कुप्रसिद्धि पा रहा है...
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3 comments:

  1. वाकई सच कहा आपने!

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  2. आज आपके ब्लॉग पर पहली बार आया , बहुत सुन्दर और सार्थक है आपका ब्लॉग

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