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Sunday, December 5, 2010

5.5 तीनों जाँच आयोगों के बारे में



देश आजाद होने के बाद संसद में कई बार माँग उठती है कि कथित विमान-दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए सरकार कोशिश करे। मगर प्रधानमंत्री नेहरूजी इस माँग को प्रायः दस वर्षों तक टालने में सफल रहते हैं। भारत सरकार इस बारे में ताईवान सरकार (फारमोसा का नाम अब ताईवान हो गया है) से भी सम्पर्क नहीं करती।
अन्त में, जनप्रतिनिधिगण जस्टिस राधाविनोद पाल की अध्यक्षता में गैर-सरकारी जाँच आयोग के गठन का निर्णय लेते हैं। तब जाकर नेहरूजी 1956 में भारत सरकार की ओर से जाँच-आयोग के गठन की घोषणा करते हैं।
लोग सोच रहे थे कि जस्टिस राधाविनोद पाल को ही आयोग की अध्यक्षता सौंपी जायेगी। विश्वयुद्ध के बाद जापान के युद्धकालीन प्रधानमंत्री सह युद्धमंत्री जेनरल हिदेकी तोजो पर जो युद्धापराध का मुकदमा चला था, उसकी ज्यूरी (वार क्राईम ट्रिब्यूनल) के एक सदस्य थे- जस्टिस पाल। मुकदमे के दौरान जस्टिस पाल को जापानी गोपनीय दस्तावेजों के अध्ययन का अवसर मिला था, अतः स्वाभाविक रुप से वे उपयुक्त व्यक्ति थे जाँच-आयोग की अध्यक्षता के लिए। 
(प्रसंगवश जान लिया जाय कि ज्यूरी के बारह सदस्यों में से एक जस्टिस पाल ही थे, जिन्होंने जेनरल तोजो का बचाव किया था। जापान ने दक्षिण-पूर्वी एशियायी देशों को अमेरीकी, ब्रिटिश, फ्राँसीसी और पुर्तगाली आधिपत्य से मुक्त कराने के लिए युद्ध छेड़ा था। नेताजी के दक्षिण एशिया में अवतरण के बाद भारत को भी ब्रिटिश आधिपत्य से छुटकारा दिलाना उसके एजेण्डे में शामिल हो गया। आजादी के लिए संघर्ष करना कहाँ से अपराधहो गया? जापान ने कहा था- एशिया- एशियायियों के लिए’- इसमें गलत क्या था? जो भी हो, जस्टिस राधाविनोद पाल का नाम जापान में सम्मान के साथ लिया जाता है।)
मगर नेहरूजी को आयोग की अध्यक्षता के लिए सबसे योग्य व्यक्ति शाहनवाज खान नजर आते हैं।
शाहनवाज खान- उर्फ, लेफ्टिनेण्ट जेनरल एस.एन. खान। कुछ याद आया?
आजाद हिन्द फौज के भूतपूर्व सैन्याधिकारी, जो शुरु में नेताजी के दाहिने हाथ थे, मगर इम्फाल-कोहिमा फ्रण्ट से उनके विश्वासघात की खबर आने के बाद नेताजी ने उन्हें रंगून मुख्यालय वापस बुलाकर उनका कोर्ट-मार्शल करने का आदेश दे दिया था।
उनके बारे में यह भी बताया जाता है कि कि लाल-किले के कोर्ट-मार्शल में उन्होंने खुद यह स्वीकार किया था कि आई.एन.ए./आजाद हिन्द फौज में रहते हुए उन्होंने गुप्त रुप से ब्रिटिश सेना को मदद ही पहुँचाने का काम किया था। यह भी जानकारी मिलती है कि बँटवारे के बाद वे पाकिस्तान चले गये थे, मगर नेहरूजी उन्हें भारत वापस बुलाकर अपने मंत्रीमण्डल में उन्हें सचिव का पद देते हैं।
विमान-दुर्घटना में नेताजी को मृत घोषित कर देने के बाद शाहनवाज खान को नेहरू मंत्रीमण्डल में मंत्री पद (रेल राज्य मंत्री) प्रदान किया जाता है।
आयोग के दूसरे सदस्य सुरेश कुमार बोस (नेताजी के बड़े भाई) खुद को शाहनवाज खान के निष्कर्ष से अलग कर लेते हैं। उनके अनुसार, जापानी राजशाही ने विमान-दुर्घटना का ताना-बाना बुना है, और नेताजी जीवित हैं। वे अपनी रिपोर्ट अलग से तैयार करते हैं।
***
शाहनवाज आयोग का निष्कर्ष देशवासियों के गले के नीचे नहीं उतरता है। साढ़े तीन सौ सांसदों द्वारा पारित प्रस्ताव के आधार पर सरकार को 1970 में (11 जुलाई) एक दूसरे आयोग का गठन करना पड़ता है। यह इन्दिराजी का समय है। इस आयोग का अध्यक्ष जस्टिस जी.डी. खोसला को बनाया जाता है।
जस्टिस घनश्याम दास खोसला के बारे में तीन तथ्य जानना ही काफी होगाः
1. वे नेहरूजी के मित्र रहे हैं;
2. वे जाँच के दौरान ही श्रीमती इन्दिरा गाँधी की जीवनी लिख रहे थे, और
3. वे नेताजी की मृत्यु की जाँच के साथ-साथ तीन अन्य आयोगों की भी अध्यक्षता कर रहे थे।
एक चौथी बात भी है, जिसे ध्यान में रखा जाना चाहिए। 1920 में लन्दन में जो भारतीय युवक आई.सी.एस. की तैयारी कर रहे थे, उनमें नेताजी के अलावे ये जी.डी. खोसला भी थे। इस परीक्षा में नेताजी ने दूसरा स्थान प्राप्त किया था- प्रथम स्थान हासिल करने वाले ये जी.डी. खोसला ही थे। एक बार नेताजी कुछ युवकों के बीच अपने इरादे के बारे में बात कर रहे थे कि वे पिताजी का मन रखने के लिए यह परीक्षा दे रहे हैं और आई.सी.एस. में चयनित होने के बाद वे इस्तीफा देकर देशसेवा के काम में उतरेंगे। बगल से गुजर रहे खोसला यह सुनकर जवाब देते हैं कि ब्रिटिश सेवाओं में अँग्रेजों के मातहत नौकरी करने से देशभक्ति में कोई कमी नहीं आ जाती। नेताजी कोई उत्तर नहीं देते- बस खोसला की तरफ एकबार देखते हैं। ....और इस एक नजरने ही युवकों के उस समूह के बीच खोसला को लज्जित कर दिया था!
दशकों बाद जाँच आयोग की रपट लिखते समय जी.डी. खोसला ने अपने उसी अपमानका बदला लेने के लिए जहाँ तक हो सका, नेताजी का कद छोटा करने की कोशिश अगर की हो, तो इसमें आश्चर्य क्या है?
                सांसदों के दवाब के चलते आयोग को इस बार ताईवान भेजा जाता है। मगर ताईवान जाकर जस्टिस खोसला किसी भी सरकारी संस्था से सम्पर्क नहीं करते- वे बस हवाई अड्डे तथा शवदाहगृह से घूम आते हैं। कारण यह बताया जाता है कि ताईवान के साथ भारत का कूटनीतिक सम्बन्ध नहीं है।    हाँ, कथित विमान-दुर्घटना में जीवित बचे कुछ लोगों का बयान यह आयोग लेता है, मगर पाकिस्तान में बसे मुख्य गवाह कर्नल हबिबुर्रहमान खोसला आयोग से मिलने से इन्कार कर देते हैं। 
                खोसला आयोग की रपट पिछले शाहनवाज आयोग की रपट का सारांश साबित होती है। इसमें अगर नया कुछ होता है, तो वह है- भारत सरकार को इस मामले में पाक-साफ एवं ईमानदार साबित करने की पुरजोर कोशिश।     
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28 अगस्त 1978 को संसद में प्रोफेसर समर गुहा के सवालों का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई कहते हैं कि कुछ ऐसे आधिकारिक दस्तावेजी अभिलेख (Official Documentary Records) उजागर हुए हैं, जिनके आधार पर; साथ ही, पहले के दोनों आयोगों के निष्कर्षों पर उठने वाले सन्देहों तथा (उन रपटों में दर्ज) गवाहों के विरोधाभासी बयानों के मद्देनजर, सरकार के लिए यह स्वीकार करना मुश्किल है कि वे निर्णय अन्तिम हैं।
प्रधानमंत्री जी का यह आधिकारिक बयान अदालत में चला जाता है और वर्षों बाद (30 अप्रैल, 1998 को) कोलकाता उच्च न्यायालय सरकार को आदेश देता है कि उन अभिलेखों के प्रकाश में फिर से इस मामले की जाँच करवायी जाय।
अब भाजपा के नेतृत्व वाली राजग की सरकार है। दो-दो जाँच आयोगों का हवाला देकर सरकार इस मामले से पीछा छुड़ाना चाह रही थी, मगर न्यायालय के आदेश के बाद सरकार को तीसरे आयोग के गठन को मंजूरी देनी पड़ती है। यह दिन है 1999 का 14 मई।
इस बार सरकार को मौका न देते हुए आयोग के अध्यक्ष के रुप में (अवकाशप्राप्त) न्यायाधीश श्री मनोज कुमार मुखर्जी की नियुक्ति खुद सर्वोच्च न्यायालय ही कर देता है।
जहाँ तक हो पाता है, सरकार मुखर्जी आयोग के गठन और उनकी जाँच में रोड़े अटकाने की कोशिश करती है, मगर जस्टिस मुखर्जी जीवट के आदमी साबित होते हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी वे जाँच को आगे बढ़ाते रहते हैं।
आयोग सरकार से उन दस्तावेजों (टॉप सीक्रेटपी.एम.ओ. फाईल 2/64/78-पी.एम.) की माँग करता है, जिनके आधार पर 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संसद में बयान दिया था, और जिनके आधार पर कोलकाता उच्च न्यायालय ने तीसरे जाँच-आयोग के गठन का आदेश दिया था। प्रधानमंत्री कार्यालय और गृहमंत्रालय दोनों साफ मुकर जाते हैं- ऐसा कोई दस्तावेज नहीं हैं; ...होंगे भी तो हवा में गायब हो गये!   
                आप यकीन नहीं करेंगे कि जो दस्तावेज खोसला आयोग को दिये गये थे, वे दस्तावेज तक मुखर्जी आयोग को देखने नहीं दिये जाते, ‘गोपनीयएवं अति गोपनीयदस्तावेजों की बात तो छोड़ ही दीजिये। प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, सभी जगह से नौकरशाहों का यही एक जवाब-
भारत के संविधान की धारा 74(2) और साक्ष्य कानून के भाग 123 एवं 124 के तहत इन दस्तावेजों को आयोग को नहीं दिखाने का प्रिविलेजउन्हें प्राप्त है!
भारत सरकार के रवैये के विपरीत ताईवान सरकार मुखर्जी आयोग द्वारा माँगे गये एक-एक दस्तावेज को आयोग के सामने प्रस्तुत करती है। चूँकि ताईवान के साथ भारत के कूटनीतिक सम्बन्ध नहीं हैं, इसलिए भारत सरकार किसी प्रकार का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दवाब ताईवान सरकार पर नहीं डाल पाती है।
हाँ, रूस के मामले में ऐसा नहीं है। भारत का रूस के साथ गहरा सम्बन्ध है, अतः रूस सरकार का स्पष्ट मत है कि जब तक भारत सरकार आधिकारिक रुप से अनुरोध नहीं भेजती, वह आयोग को न तो नेताजी से जुड़े गोपनीय दस्तावेज देखने दे सकती है और न ही कुजनेत्स, क्लाश्निकोव- जैसे महत्वपूर्ण गवाहों का साक्षात्कार लेने दे सकती है। आप अनुमान लगा सकते हैं- आयोग रूस से खाली हाथ लौटता है।
जहाँ तक ब्रिटेन स्थित राष्ट्रमण्डल अभिलेखागार की बात है, वहाँ से जवाब आया था कि 1945 के इन गोपनीय दस्तावेजों को 2020 से पहले सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। 
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2005 में दिल्ली में फिर काँग्रेस के नेतृत्व में संप्रग की सरकार बनती है। यह सरकार मई में जाँच आयोग को छह महीनों का विस्तार देती है।
8 नवम्बर को आयोग अपनी रपट सरकार को सौंप देता है। स्वाभाविक रुप से सरकार इस पर कुण्डली मारकर बैठ जाती है। दवाब पड़ने पर 18 मई 2006 को रपट को संसद के पटल पर रखा जाता है।
मुखर्जी आयोग को पाँच विन्दुओं पर जाँच करना था-
1. नेताजी जीवित हैं या मृत?
2. अगर वे जीवित नहीं हैं, तो क्या उनकी मृत्यु विमान-दुर्घटना में हुई, जैसा कि बताया जाता है?
3. क्या जापान के रेन्कोजी मन्दिर में रखा अस्थिभस्म नेताजी का है?
4. क्या उनकी मृत्यु कहीं और, किसी और तरीके से हुई; अगर ऐसा है, तो कब और कैसे?
5. अगर वे जीवित हैं, तो अब वे कहाँ हैं?
आयोग का निष्कर्ष कहता है कि-
1. नेताजी अब जीवित नहीं हैं। 
2. किसी विमान-दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु नहीं हुई है।
3. रेन्कोजी मन्दिर (टोक्यो) में रखा अस्थिभस्म नेताजी का नहीं है।
4. उनकी मृत्यु कैसे और कहाँ हुई- इसका जवाब आयोग नहीं ढूँढ़ पाया।
5. इसका उत्तर क्रमांक 1 में दे दिया गया है। 
                स्वाभाविक रुप से, सरकार इस रिपोर्ट को खारिज कर देती है। 
                ***
यह सही है कि सरकार तथा नेताजी के परिजनों से जस्टिस मुखर्जी को जाँच में वैसा सहयोग नहीं मिला, जैसा कि मिलना चाहिए था; फिर भी, जिस जीवटता के साथ उन्होंने जाँच पूरी की, उसे देखते हुए यह एक रहस्य ही लगता है कि वे चौथेविन्दु की जाँच को परिणति तक क्यों नहीं पहुँचा सके?
एक और सवाल है- बिना मृत्यु का सबूत देखे एक न्यायाधीश भला किसी को मृतकैसे घोषित कर सकता है?  
अगर हम यहाँ यह अनुमान लगायें कि भारत सरकार ने अराजकताया राजनीतिक अस्थिरताफैलने की बात कहकर मुखर्जी आयोग को चौथेविन्दु पर ज्यादा आगे न बढ़ने का अनुरोध किया होगा, तो क्या हम बहुत गलत होंगे?
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7 comments:

  1. जयदीप जी, संविधान का अनुच्छेद ७४(२) और इण्डियन इवीडेंस एक्ट की धारायें १२३ और १२४ का भरपूर दुरुपयोग किया गया और जा रहा है.... हर प्रकार की गोपनीयता को हटाया जाये.. नौकरशाहों के लिये मेरे भी वही विचार हैं...

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  2. जयदीप भाई ,
    जय हिंद !

    अपने देश में सिर्फ़ नाम का ही लोकतंत्र चल रहा है होता वही है जो तख्त पर बैठा राजा चाहता है ! नेता जी को इतिहास में दफ़न कर देने की इन लोगो की कोशिश कामयाब नहीं होगी एक ना एक दिन सच सामने आ कर रहेगा !

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  3. This comment has been removed by the author.

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  4. जय दीप भाई,
    नमस्कार !
    भारत सरकार का नियम है कि २० वर्षों के बाद सरकारी दस्तावजों को नष्ट किया जा सकता है और इसके लिए किसी भी अधिकारी को दंडित नहीं किया जा सकता अत: १९५६ में गठित प्रथम जांच आयोग द्वारा जो सबूत एकत्र किये गए थे उन्हें दूसरे आयोग को नहीं सौंपा गया अपितु प्रधान मंत्री कार्यालय में अति गोपनीय करार देकर सुरक्षित रख लिया गया ! लोग सच्चे थे और उन्होंने सबूतों की कोई नक़ल तैयार नहीं की थी! इस तरह लोगों से सबूत एकत्र कर लिए गए, इसके पश्चात तीसरा आयोग गठित हुआ और तब तक यह सबूत नष्ट कर दिए गए थे ! मैंने स्वयं सुभाष जी से आशीर्वाद लिया है और उनकी मृत्यू पर जो सम्मान भारत सरकार ने उन्हें दिया, वह अन्य किसी को कभी नही दिया गया-कृपया मेरी पुस्तक पढ़ें ! यह ब्लॉग पर लिख दी गई है ! आप को यह तथ्य जान कर ग्लानि होगी कि नेहरु सरकार ने सुभाष बोस को ब्लैक मेल किया था !

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    1. can u provide me link of your book?

      Thanks
      Deepak Tyagi

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  5. इस ब्लॉग के बाँये हाशिये पर ऊपर पुस्तक के आवरण का जो चित्र है, उसपर क्लिक करने से भी पुस्तक मँगवाने का वेब पेज खुलेगा.

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