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Sunday, June 13, 2010

2.2 ‘इण्डियन लीज़न’ के साथ भारत-प्रवेश की योजना



राजनीतिक कारणों से नेताजी के जर्मनी में होने की खबर को गुप्त रखा जाता है और विदेश विभाग को नेताजी का ध्यान रखने के लिए कहा जाता है। उन्हें सिन्योर ऑरलैण्डो माजोत्ताया हिज एक्सेलेन्सी माजोत्ताके नाम से ही सम्बोधित किया जाता है।
मगर नेताजी कार्रवाई के लिए व्यग्र हैं।
9 अप्रैल 1941 को नेताजी जर्मन सरकार के सामने अपना वक्तव्य (Memorandum) प्रस्तुत करते हैं, जिसमें धुरी राष्ट्र और भारत के बीच सहयोग, यूरोप (जहाँ तक हो सके, बर्लिन) में स्वतंत्र भारत सरकारके गठन, एक स्वतंत्र भारत रेडियो प्रसारण, अफगानिस्तान (काबुल) में भूमिगत कार्रवाई, ऋण के रूप में (इस) स्वतंत्र भारत सरकार को जर्मन आर्थिक सहायता और भारत में ब्रिटिश सेना को हराने के लिए जर्मन सेना की मदद का जिक्र होता है। इसी के साथ दिये गये परिशिष्ट में जिक्र होता है कि भारत और अरब देशों की आजादी की घोषणा जल्दी ही की जाय।
इस वक्तव्य पर फैसला लेने में जर्मन सरकार काफी देर करती है। नेताजी परेशान हो जाते हैं। विदेश विभाग के अधिकारी उन्हें सान्त्वना देते हैं।
अन्त में, जर्मनी नेताजी को बिना शर्त पूर्ण समर्थन देने के लिए राजी होता है। फ्री इण्डिया सेण्टरऔर फ्री इण्डिया रेडियो’ (आजाद हिन्द रेडियो) का गठन होता है। इन संस्थाओं को चलाने के लिए पर्याप्त धन की व्यवस्था की जाती है, और नेताजी को इन्हें चलाने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की जाती है। खुद नेताजी को गाड़ी-बँगला सब मिला होता है।
करार के अनुसार, देश के आजाद होने के बाद नेताजी जर्मनी का सारा ऋण चुका देंगे।
2 नवम्बर 1941 को सेण्टर की पहली बैठक में चार ऐतिहासिक निर्णय लिये जाते हैं- 1. ‘जय हिन्दअभिवादन का तरीका होगा, 2. ‘जन-गण-मनराष्ट्रगीत होगा, 3. हिन्दुस्तानी (उर्दू-मिश्रित हिन्दी) राष्ट्रभाषा होगी, और 4. नेताजी को नेताजीके नाम से सम्बोधित किया जायेगा। (नेताजीशब्द को जर्मन शब्द फ्यूहररका समानार्थी माना जा सकता है, जिसका प्रयोग हिटलर के लिए किया जाता था।) 
इसके बाद नेताजी खुद आजाद हिन्द रेडियो पर भाषण देकर दुनिया के सामने प्रकट होते हैं। सारे देश में खुशी की लहर दौड़ जाती है- कि उनका नेता देश को आजाद कराने के लिए अब जर्मन सेना के साथ भारत आयेगा। यह रेडियो कई भारतीय भाषाओं में नियमित प्रसारण आरम्भ करता है। नेताजी के लिए भारत से जुड़े रहने का यह जरिया बन जाता है।
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नेताजी द्वारा दिये गये विवरण में भारतीय मुक्ती वाहिनी’ (Liberation Army of India) के गठन का जिक्र नहीं होता है। दरअसल, बाद में, रेडियो स्टेशन पर कुछ भारतीय युद्धबन्दियों से मिलने के बाद उनके मन में अपनी सेना गठित करने का विचार आता है। ये भारतीय सैनिक उत्तरी अफ्रिका में ब्रिटेन की ओर से लड़ते हुए धुरी राष्ट्रकी सेना द्वारा बन्दी बनाये गये हैं। (फील्डमार्शल रोमेल के नेतृत्व में धुरी राष्ट्र की सेना वहाँ विजय प्राप्त कर रही है।) इन्हें रेडियो स्टेशन लाया जाता है- बी.बी.सी. द्वारा हिन्दुस्तानी भाषाओं में प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों को समझने के लिए।
हिटलर नेताजी के विचार से सहमत दीखते हैं और नेताजी दिसम्बर’ 41 में युद्धबन्दी शिविर में जाकर भारतीय सैनिकों से बातचीत करते हैं। इसके अलावे बर्लिन में पढ़ाई कर रहे चालीस भारतीय युवक भी उत्साह दिखाते हैं। (प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जर्मन महिलाओं से विवाह कर वहीं बस गये भारतीय सैनिकों की सन्तानें भी नेताजी के साथ हैं- आबिद हसन इन्हीं में से एक हैं।)
25 दिसम्बर 1941 को पहले बैच के रुप में 10 छात्रों तथा 5 युद्धबन्दी सैनिकों को नेताजी प्रशिक्षण के लिए फ्रैंकेनबर्ग रवाना करते हैं- इन्हें जर्मन सेना (Wehrmacht) द्वारा बिलकुल जर्मन तरीके से प्रशिक्षण दिया जायेगा।
जर्मन सरकार के साथ करार हो गया है कि इन भारतीय सैनिकों को इन्फैण्ट्री की हर शाखा में प्रशिक्षण दिया जायेगा, जर्मन सेना के साथ इन्हें मिलाया नहीं जायेगा, भारत के अलावे इन्हें किसी और सीमा पर लड़ने के लिए नहीं भेजा जायेगा- हालाँकि अपनी रक्षा के लिए ये कहीं भी लड़ सकेंगे, और इन्हें हर वो वेतन-भत्ता-सुविधा मिलेगी, जो जर्मन सैनिकों को प्राप्य है।
ये सैनिक वायरलेस, डिमोलिशन आदि के अलावे घुड़सवारी, पर्वतारोहण, पैराशूट आदि का भी कोर्स करते हैं, और पहले बैच वाले बाद में एन.जी. स्वामी तथा आबिद हसन के साथ मिलकर युद्धबन्दी शिविर में से अगले भारतीय सैनिकों का चयन भी करते हैं।
नेताजी सैन्य पृष्ठभूमि से नहीं हैं, इसलिए अनुभव के लिए वे खुद भी सैन्य प्रशिक्षण लेते हैं।  
अफ्रिका तथा इटली से नये भारतीय युद्धबन्दियों को भी तुरन्त शिविरों में मँगवाया जाता है। इस प्रकार, भारतीय सैनिकों की एक सैन्य टुकड़ी इण्डियन लीजन“ (या आजाद हिन्द लीजन, जर्मन में- Legion Freies Indien) का गठन होता है।
अक्तूबर’ 43 में कुछ भारतीय एन.सी.ओ. (नॉन कमीशण्ड ऑफिसर) को कमीशन देकर लीजन में अधिकारी बनाया जाता है। लीजन के पास 81 मोटर गाड़ियाँ और 700 घोड़े होते हैं। इस रेजीमेण्ट में 3 बटालियन होते हैं और प्रत्येक बटालियन में 4 कम्पनियाँ। आजाद हिन्द“, ”शेर-ए-हिन्द“, ”सरदार-ए-जंग“, ”वीर-ए-हिन्दऔर शहीद-ए-भारतलीजन के सम्मान एवं पदक होते हैं। 
जब लीजन के सैनिकों की संख्या बढ़ जाती है, तब फ्री इण्डिया सेण्टर के पास इन्हें वेतन देने के लिए पैसों की कमी हो जाती है। अब एक ही रास्ता है कि जर्मन सेना इन्हें वेतन दे। ऐसे में इन सैनिकों को जर्मनी और हिटलर के प्रति वफादारी की शपथ लेनी होगी।
अपने अधिकारी की तलवार पर हाथ रखकर चार-चार की संख्या में भारतीय सैनिक जर्मन भाषा में यह शपथ लेते हैं- मैं ईश्वर के नाम पर यह पवित्र शपथ लेता हूँ कि सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में भारत की आजादी के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई में जर्मन राज्य तथा जनता के नेता के रुप में जर्मन सेना के सेनापति एडॉल्फ हिटलर के आदेशों का पालन करूँगा, और एक बहादूर सैनिक के रुप में इस शपथ की रक्षा में अपने प्राण त्यागने को तत्पर रहूँगा।
अब यह टुकड़ी जर्मन सेना की 950वीं इण्डियन इन्फैण्ट्री रेजीमेण्ट (Indisches Infanterie Regiment 950) बन जाती है। नेताजी इस रेजीमेण्ट को इसका चिन्ह- तिरंगे के बीच में छलांग लगाता शेर- प्रदान करते हैं, और कहते हैं-
आजाद भारत के इतिहास में हमारा नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जायेगा, हर एक शहीद के लिए वहाँ एक स्मारक होगा। जब हम सब एक साथ भारत में प्रवेश करेंगे, तब मैं इस सेना का नेतृत्व करूँगा।“ 
जहाँ ब्रिटिश सेना भारतीय सैनिकों को धर्म तथा क्षेत्रीयता के आधार पर बाँटकर रखती है, वहीं नेताजी सभी धर्मों तथा क्षेत्रों के सैनिकों को मिला-जुला कर रखते हैं। एक कम्पनी में मुस्लिम, हिन्दू, सिक्ख, जाट, राजपूत, मराठा और गढ़वाली सभी साथ-साथ हैं। (वैसे लीजन के दो-तिहाई सैनिक मुस्लिम हैं तथा एक तिहाई हिन्दू।)
(बाद के दिनों में सिंगापुर में आजाद हिन्द फौज के गठन में भी किसी प्रकार के भेद-भाव और अलगाव को नहीं अपनाया जाता और नेताजी की इस भावना की गाँधीजी भी तारीफ करते हैं।)
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हिटलर के रणनीतिकारों ने हिसाब लगाया था कि ’42-’43 तक ब्रिटेन, सोवियत संघ और अमेरिका- तीनों युद्ध के लिए तैयार हो जायेंगे, अतः पहले हीइन्हें मात देना जरूरी है। जून’40 तक फ्राँस को जीतने के बाद हिटलर का अगला निशाना ब्रिटेन बना। मगर इंगलिश चैनलऔर इसमें तैनात शक्तिशाली ब्रिटिश नौसेना के चलते हिटलर ने लन्दन पर पहले भीषण हवाई बमबारी का फैसला लिया और ऑपरेशन सी-लायन’ (समुद्री आक्रमण) को स्थगित रखा।
10 जुलाई से ब्रिटेन पर हवाई बमबारी शुरु होती है। ब्रिटेन का रॉयल एयर फोर्स संख्या बल में चौथाई होने के बावजूद जबर्दस्त प्रतिआक्रमण कर जर्मनी को पर्याप्त नुक्सान पहुँचाता है। जब रॉयल एयर फोर्स का प्रतिरोध ऐसा है, तो रॉयल नेवी का कैसा होगा? जर्मनी की नौसेना अपेक्षाकृत कमजोर है। अतः सितम्बर के अन्त में ब्रिटेन जीतने के अभियान को अधूरा छोड़ दिया जाता है।
अब सोवियत संघ की बारी है। आक्रमण की तैयारियाँ चल रही हैं- नाजी सेना तीव्र और निष्ठुर आक्रमण करती है। इसी को भाँपकर स्तालिन नेताजी की मदद नहीं कर पाये थे। सोवियत संघ पर आक्रमण का एक और कारण भी है- हिटलर यहूदियों, जिप्सियों, स्लाव, होमोसेक्सुअल, कमजोर और अपंगों के साथ-साथ साम्यवादियों से भी नफरत करते हैं।
22 जून 1941 को- तब तक नेताजी के जर्मनी आये हुए ढाई महीने हो चुके थे- जर्मनी सोवियत संघ पर आक्रमण करता है- अक्तूबर’ 41 तक मास्को को जीतने के इरादे से। हिटलर और स्तालिन-जैसे दो निर्दयी, कठोर और बर्बर शासक जब युद्धभूमि में आमने-सामने हों, तो एक अतिशय रक्तरंजित युद्ध की उम्मीद की जा सकती है। पहले हफ्ते में ही डेढ़ लाख सोवियत सैनिक हताहत होते हैं, बाद में दोनों तरफ के और भी लाखों मरते हैं।
नेताजी हिटलर के सोवियत आक्रमण से सहमत नहीं हैं, मगर इस वक्त उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ भारत की आजादी है।
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नेताजी योजना बनाते हैं कि इण्डियन लीजनके सैनिक नाजी सेना के पीछे रहते हुए सोवियत संघ में प्रवेश करेंगे और नाजी सेना की यह टुकड़ी उज्बेकिस्तान की ओर मुड़ जायेगी। अफगानिस्तान की सीमा पर भारत में प्रवेश करते समय लीजन के सैनिक आगे हो जायेंगे और जर्मन सैनिक पीछे।
लीजन के कुछ सैनिकों को पैराशूट द्वारा पर्शिया (अब ईरान) में भी उतारने की योजना है, जो बलूचिस्तान के रास्ते भारत में प्रवेश करेंगे और ब्रिटिश छावनियों में गुप्त रुप से घुसकर उनके युद्ध-सामग्रियों को नष्ट (सैबोटाज) करेंगे।
नेताजी बाकायदे आजाद हिन्द रेडियो पर चेतावनी देते हैं कि भारत के पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त (NWFP) पर ब्रिटिश सेना और पुलिस में तैनात हिन्दुस्तानी सिपाही इण्डियन लीजनके सैनिकों की मदद करेंगे, अन्यथा आजादी के बाद आजाद भारत सरकार के सामने उन्हें जवाब देना पड़ सकता है।
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नेताजी जर्मनी में अपनी पत्नी एमिली शेंकेल (Emilie Schenkl) के साथ रहते हैं- जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है।
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6 comments:

  1. आईये जानें .... क्या हम मन के गुलाम हैं!

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  2. भाईसाहब नेताजी भारत से बहार केवल और केवल आजाद हिंद फोज को संगठित करने के लिए ही गए थे. और इसकी प्रेरणा उन्हें वीर सावरकर ने दी थी.
    २५ जून सन १९४४ को सिंगापुर में आजाद हिंद सरकार की स्थापना पर नेताजी सुभाष चंद्र बोश ने सिंगापुर रेडियो पर अपने संदेश में कहा कि,-------"जब भ्रमित राजनैतिक विचारों और अदूरदर्शिता के कारन कांग्रेस के लगभग सभी नेता अंग्रेजी सेना में भारतीय सिपाहियों को भाड़े का टट्टू कहकर बदनाम कर रहे थे,उस समय सबसे पहले वीर सावरकर ने निर्भीकता से भारतीय युवको को सेना में भरती होने का आह्वान किया.सावरकरजी कि प्रेरणा पर सेना में भरती युवक ही हमारी आई ० एन ० ऐ ० के सिपाही बने हैं.उन्होंने इस बात का भी रहस्योद्घाटन किया कि,आइ० एन० ए० को संघटित करने कि प्रेरणा भी उन्हें सावरकर जी से ही मिली थी। उन्होंने बताया कि,जब वे सावरकर जी से मिलने मुंबई गए तब सावरकर जी ने उन्हें यह राय दी थी कि अंग्रेजों कि जेल में सड़कर मरने कि बजाय यह अच्छा होगा कि वे देश से बाहर चले जायं और आई ० एन० ए० को संगठित करें। (नेता जी सुभाष चंद्र बोश)

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  3. वीर सावरकर ने जिस स्वतंत्रता की ज्वाला को अग्नि दे थी.उसे पूर्ण रूप से विराम नेताजी ने ही दिया था. गाँधी और नेहरू तो बीच में ही मजे ले गए.

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  4. बढ़िया जानकारी दी आपने आभार !

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  5. ये 1941-42 की बातें हैं, आई.एन.ए. / आज़ाद हिन्द फौज़ का जिक्र 1943-45 में आयेगा.

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  6. बहुत अच्छी जानकारी, शुभकामना!

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