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Thursday, June 10, 2010

1.3: ‘अपना रास्ता अलग चुन लो’



                भारत लौटने पर 1938 में गाँधीजी नेताजी को काँग्रेस का अध्यक्ष मनोनीत करते हैं।
                ’37 में नेहरूजी अध्यक्ष थे, और अब ’39 में किसी और की बारी है।
                नेताजी चाहते हैं कि प्रगतिशील विचारों वाला कोई व्यक्ति ही अगला अध्यक्ष बने, मगर ऐसा नहीं होते देख वे दुबारा अध्यक्ष बनना चाहते हैं। जबकि काँग्रेस की यह परम्परा बन गयी है कि गाँधीजी द्वारा मनोनीत व्यक्ति ही अध्यक्ष बनेगा। नेताजी इस परम्परा के खिलाफ चले जाते हैं और नौबत चुनाव की आ जाती है।
                आश्चर्यजनक रुप से नेताजी (गाँधीजी द्वारा मनोनीत पट्टाभि सीतारामैया को हराकर) दुबारा काँग्रेस के अध्यक्ष चुन लिये जाते हैं। बाद में गाँधीजी नेताजी के साथ असहयोगका रवैया अपना लेते हैं। उनके कहने पर महासमिती के 14 में से 12 सदस्य इस्तीफा दे देते हैं, सिर्फ एक ही सदस्य (नेताजी के बड़े भैया) नेताजी के साथ रहते हैं; जबकि नेहरूजी तटस्थता की नीति अपनाते हैं।
                नेताजी का कहना है कि जब देश के सबसे महान व्यक्ति (गाँधीजी) का ही समर्थन उन्हें हासिल नहीं है, तो यह पद बेकार है, और वे अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे देते हैं।
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                उधर यूरोप में 1 सितम्बर 1939 को जर्मनी पोलैण्ड पर आक्रमण करता है। दो दिनों बाद ब्रिटेन और फ्राँस जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा करते हैं, और इस प्रकार, दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत हो जाती है।
                भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगॉ बिना काँग्रेस से परामर्श किये भारत को भी युद्धरत देश घोषित कर देते हैं। लाचार काँग्रेसी नेतागण अब ब्रिटेन को युद्ध में पूर्ण समर्थन देने को राजी हो जाते हैं और बदले में युद्ध के बाद आजादी का वायदा माँगते हैं। ब्रिटिश सरकार इस माँग को ठुकरा देती है।
                इधर नेताजी का स्पष्ट मत है कि आजादी भीख माँगकर नहीं लेनी चाहिए। इसकी कीमत ऊँची होती है और कीमत चुकाकर ही इसे हासिल करना चाहिए! उनकी नजर में यह विश्वयुद्ध भारत के लिए एक सुनहरा मौका है- और भारत को ब्रिटेन के शत्रु देशों से हाथ मिलाकर आजादी के लिए सैन्यअभियान चलाना चाहिए।
                इस हिंसाभरे प्रस्ताव पर गाँधीजी तथा अन्य नेताओं के साथ नेताजी के मतभेद बढ़ जाते हैं। गाँधीजी स्पष्ट कर देते हैं कि सुभाष, तुम अपना रास्ता अलग चुन लो।
                नेताजी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के माध्यम से (बेशक गुप्त रुप से) स्तालिन को भारत की आजादी में मदद के लिए सन्देश भेजते हैं। सम्भवतः स्तालिन नेताजी को मास्को आने का न्यौता भी देते हैं।
                ब्रिटिश सरकार को भनक मिलती है- वह नेताजी को जेल में डालने की जुगत में लग जाती है।
                नेताजी द्वारा हॉलवेल स्मारक’¹ तोड़ने की घोषणा के बाद सरकार को मौका मिल जाता है और भारत सुरक्षा कानून (धारा- 129) (Defence of India Act, Article- 129) के तहत 2 जुलाई 1940 को नेताजी को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाता है। इस कानून के तहत सुनवाई की गुंजाइश नहीं है।
                नेताजी समझ जाते हैं कि विश्वयुद्ध समाप्त होने तक सरकार उन्हें जेल में ही रखने का इरादा रखती है।
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¹‘हॉलवेल स्मारक’: 19 जून 1756 को सिराजुद्दौला ने कोलकाता फोर्ट विलियम पर कब्जा कर लिया था। सिराज के सैनिकों को बदनाम करने के लिए जॉन हॉलवेल ने यह कथा गढ़ी थी कि 146 अँग्रेजों एवं ऐंग्लो इण्डियन को किले के गार्डरूम में बन्द कर दिया गया था, जिससे 123 लोग दम घुटने से मर गये। बाद में अँग्रेजों ने- भारतीयों को क्रूर साबित करने के लिए- इस गार्डरूम को स्मारक बना दिया था।

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