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Wednesday, June 9, 2010

1.2: ‘विश्वयुद्ध’ की पटकथा







                पिताजी का मन रखने के लिए 1920 में आई.सी.एस. (आज का आई.ए.एस.) अधिकारी बने नेताजी 1921 में ही नौकरी छोड़कर राजनीति में उतरते हैं।
                ग्यारह बार गिरफ्तार करने के बाद ब्रिटिश सरकार उन्हें 1933 में देश निकालाही दे देती है। यूरोप में निर्वासन बिताते हुए वे अपनी यकृत की थैली की शल्य-चिकित्सा भी कराते हैं।
                1934 में पिताजी की मृत्यु पर तथा 1936 में काँग्रेस के (लखनऊ) अधिवेशन में भाग लेने के लिए वे दो बार भारत आते हैं, मगर दोनों ही बार ब्रिटिश सरकार उन्हें गिरफ्तार कर वापस देश से बाहर भेज देती है।
                1933 से ’38 तक यूरोप में रहते हुए नेताजी ऑस्ट्रिया, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया, फ्राँस, जर्मनी, हंगरी, आयरलैण्ड, इटली, पोलैण्ड, रुमानिया, स्वीजरलैण्ड, तुर्की और युगोस्लाविया की यात्राएँ करते हैं और यूरोप की राजनीतिक हलचल का गहन अध्ययन करते हैं।
                नेताजी भाँप लेते हैं कि एक दूसरे विश्वयुद्ध की पटकथा यूरोप में लिखी जा रही है। वे इस भावीविश्वयुद्ध में ब्रिटेन के शत्रु देशों से हाथ मिलाकर देश को आजाद कराने के बारे में सोचते हैं। 
                नेताजी के शब्दः
                ”विश्व में पिछले दो सौ वर्षों में आजादी पाने के लिए जितने भी संघर्ष हुए हैं, उन सबका मैंने गहन अध्ययन किया है, और पाया है कि एक भी ऐसा उदाहरण कहीं नहीं है, जहाँ आजादी बिना किसी बाहरी मदद के मिली हो।“ 
                जाहिर है, नेताजी की नजर में भारत को भी अपनी आजादी के लिए किसी और देश से मदद लेनी चाहिए। आखिर किस देश से?
                नेताजी की पहली पसन्द है- सोवियत संघ, स्तालिन जहाँ के राष्ट्रपति हैं। नेताजी अनुभव करते हैं कि सोवियत संघ निकट भविष्य में ब्रिटिश साम्राज्यवाद को चुनौती देने वाला है। (वैसे भी, दोनों परम्परागत शत्रु थे।) उनका यह भी मानना था कि भारत को आजाद कराने के बाद सोवियत संघ भारत में पैर नहीं जमायेगा।
                मगर नेताजी को सोवियत संघ जाने के लिए वीसा नहीं दिया जाता है। उन्हें ब्रिटेन भी नहीं जाने दिया जाता है।
                यूरोप में ब्रिटिश सरकार ने कोई एक दर्जन जासूस नेताजी की निगरानी में लगा रखे हैं। नेताजी क्या खाते हैं, कहाँ जाते हैं, किन लोगों से मिलते हैं- हर खबर सरकार को मिल रही है।
                *****


 1.2 (क) एमिली शेंकेल प्रसंग


                यहाँ एमिली शेंकेल का जिक्र करना अनुचित नहीं होगा, हालाँकि यह नेताजी का व्यक्तिगत प्रसंग है। 
                1934 में नेताजी वियेना (ऑस्ट्रिया) में एमिली शेंकेल से मिलते हैं। दरअसल, नेताजी को अपनी पुस्तक द इण्डियन स्ट्रगलके लिए एक स्टेनोग्राफर की जरुरत है, जो अँग्रेजी जानती हो। इस प्रकार एमिली पहले नेताजी की स्टेनो, फिर सेक्रेटरी बनती है, और फिर दोनों एक-दूसरे से प्रेम करने लगते हैं।
                अपनी पुस्तक की भूमिका में नेताजी सिर्फ एमिली को ही नाम लेकर धन्यवाद देते हैं (दिनांक 29 नवम्बर 1934)। कई यात्राओं में एमिली नेताजी की हमसफर होती हैं।
                26 दिसम्बर 1937 को- एमिली के जन्मदिन पर- नेताजी बैडगैस्टीन में उनसे विवाह करते हैं।
                1938 में भारत लौटने के बाद से नेताजी एमिली को नियमित रुप से चिट्ठियाँ लिखते हैं। (उनके 162 पत्रों का संकलन पुस्तक के रुप में प्रकाशित हुआ है। हालाँकि दक्षिण-पूर्व एशिया से लिखे गये उनके पत्र इनमें शामिल नहीं हैं- इन पत्रों को द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटिश अधिकारी जब्त कर लेते हैं- वियेना में एमिली के घर की तलाशी के दौरान। ये पत्र अब तक अज्ञात ही हैं।)
                1941-43 में जर्मनी प्रवास के दौरान नेताजी एमिली शेंकेल के साथ ही बर्लिन में रहते हैं।
                1942 के अन्त में एमिली और नेताजी माता-पिता बनते हैं। वे अपनी बेटी का नाम अनिता रखते हैं।
                ***
                1944 की बरसात में, जब इम्फाल-कोहिमा युद्ध में हार निश्चित जान पड़ती है, तब नेताजी यह महसूस करते हैं वे शायद अब एमिली और अपनी नन्हीं बेटी से कभी न मिल पायें, क्योंकि अगले साल हार तय है और इस हार का मतलब है- उन्हें कहीं अज्ञातवास में जाना पड़ेगा, या जेल में रहना पड़ेगा, या फिर मृत्यु को गले लगाना पड़ेगा।
                एक शाम, जब आसमान काले बादलों से घिरा होता है, वे एकान्त पाकर कैप्टन लक्ष्मी विश्वनाथन से कहते हैं, ”यूरोप में मैंने कुछ ऐसा किया है, जिसे पता नहीं, भारतवासी कभी समझ पायेंगे या नहीं।उनका ईशारा एमिली की ओर है, कि पता नहीं भारतीय कभी उन्हें नेताजी की पत्नीका दर्जा देंगे या नहीं।
                कितना भी तो भारतीयों के लिए यह एक गन्धर्व विवाहहै।
                लक्ष्मी कहती हैं, ”जरूर समझेंगे।
                एमिली शेंकेल बोस तो खैर कभी भारत नहीं आतीं, मगर 1945 में नेहरुजी तथा नेताजी के परिजनों के प्रयासों से बाकायदे एक ट्रस्ट बनाकर एमिली को नियमित आर्थिक मदद दी जाती है, जिसके लिए एमिली नेहरुजी का बाकायदे आभार व्यक्त करती हैं।
                एमिली शेंकेल बोस का निधन वर्ष 1996 में होता है।
                ***
                नेताजी की बेटी अनिता बोस बाद के दिनों में ऑग्सबर्ग विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्राध्यापिका बनती हैं। जर्मन संसद में ग्रीन पार्टी के सदस्य मार्टिन पाफ (Martin Pfaff) से वे विवाह करती हैं और उनकी तीन सन्तानों- यानि नेताजी के नाती-नतनियों- के नाम होते हैं- थॉमस कृष्णा, माया कैरिना और पीटर अरूण।
                अनिता बोस पहली बार 18 वर्ष की उम्र में 1960 में भारत आती हैं और फिर 2005-06 में 63 वर्ष की उम्र में दुबारा भारत आती हैं।
                दोनों बार देश उन्हें नेताजी की बेटीका सम्मान देता है।
                *****





7 comments:

  1. आगे के घटनाक्रम को जानने की तीव्र इच्छा है |

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  2. अद्भुत संकलन है ..
    मेरे दो ही प्रेरणा स्रोत हैं उनमे पहला स्थान नेता जी का है ......क्या आप सारी जानकारी मेरे ईमेल पे भेज सकते हैं ..?

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  3. मुकेश जी,
    जय हिन्द.
    बहुत अच्छा लगा कि संकलन आपको पसन्द आया.
    सम्पूर्ण लेखमाला की पाण्डुलिपि वाग्देवी (http://www.vagdevi.biz/intro.php) प्रकाशन, बीकानेर के पास है. वे कह रहे हैं कि किसी जानकार से प्रामाणिकता की जाँच करवाने के बाद वे इसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर सकते हैं.
    अगर पुस्तक छपती है, तो बेशक आपतक इसकी सूचना पहुँच जायेगी.
    ईति.

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  4. this has to be extensive published and shared with the youth of india

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  5. मेरे दो ही प्रेरणा स्रोत हैं उनमे पहला स्थान नेता जी का है ......क्या आप सारी जानकारी मेरे ईमेल पे भेज सकते हैं ..?
    I request to you please send me complete information related to 1939 congress president election.I am little confused, why mahatma Ghandhi not supported to Subhas Chandra Bose in this election?

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  6. मेरे दो ही प्रेरणा स्रोत हैं उनमे पहला स्थान नेता जी का है ......क्या आप सारी जानकारी मेरे ईमेल पे भेज सकते हैं ..?
    I request to you please send me complete information related to 1939 congress president election.I am little confused, why mahatma Ghandhi not supported to Subhas Chandra Bose in this election?

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